बैकुंठ चतुर्दशी – हरि और हर के मिलन पर मनाया जाता है यह पावन त्यौहार है

46

कार्तिक माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को बैकुंठ चतुर्दशी का पावन त्योहार मनाया जाता है। इस पावन दिन भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा का विधान है। जब भगवान विष्णु चार महीने के लिए नींद में जाते हैं तो सृष्टि का कार्यभार भगवान शिव को सौंप दिया जाता है। देवउठनी एकादशी के दिन भगवान श्री हरि नींद से जागते हैं और बैकुंठ चतुर्दशी के दिन भगवान शिव फिर उन्हें सृष्टि का कार्यभार सौंप देते हैं। इस दिन भगवान शिव से मिलने वाले भगवान विष्णु काशी जाते हैं। हर और हरी के मिलन की इस चतुर्दशी को बैकुंठ चतुर्दशी नाम से जाना गया है।

इस पावन व्रत से भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की कृपा प्राप्त होती है। बैकुंठ चतुर्दशी को सप्तऋषि की पूजा करने से सभी तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस दिन पवित्र नदी या सरोवर किनारे तर्पण करने से पितृों की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि जो भी बैकुंठ चतुर्दशी के दिन देह त्यागता है उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान विष्णु को कमल का फूल और भगवान शिव को जल अर्पित करने से विशेष कृपा प्राप्त होती है। बैकुंठ चतुर्दशी की पूजा मध्य रात्रि में की जाती है। इस व्रत में श्रीमद्भागवतगीता और विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करें। बैकुंठ चतुर्दशी के व्रत से सुख-समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है। इस दिन भगवान को मद्य की खीर का भोग पाते हैं।

इस ग्राफ़ में दी गई बदलाव धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिन्हें केवल सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

Source link

NO COMMENTS

Leave a Reply