यह है नवरात्रि में माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के उपाय इन पाठों को अवश्य पढ़ना चाहिए

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17 अक्टूबर 2020 से शारदीय नवरात्र आरंभ हो रहे हैं। इस बार माँ भगवतीश्वर पर सवार होकर आएगी। हिंदू परिवारों में शारदीय नवरात्रि और वासंतिक नवरात्रों में मां दुर्गा की आराधना करने की परंपरा प्राचीन काल है। माँ भगवती शक्ति का प्रतीक है। दुर्गा माता की आराधना करने से सभी प्रकार के कष्ट निवारण होते हैं। नवरात्रों में मां भगवती के आराधक विभिन्न प्रकार के माता को प्रसन्न करने के प्रयत्न करते हैं। नवरात्रों में दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ करना बहुत ही फलदायी माना गया है। दुर्गा सप्तशती में तीन वर्ण- प्रथम, मध्यम और उत्तर वर्ण और 13 अध्याय हैं। आजकल कार्य की व्यस्तता के कारण कुछ लोग सप्तशती के 13 अध्याय नहीं पढ़ पाते हैं। उनके लिए शास्त्रों में एक विधान है कि सात दिनों में 13 अध्याय कैसे पूरे करें। इसके लिए यह क्रम जानना बहुत आवश्यक है।
-प्रथम नवरात्रि को प्रथम अध्याय का पाठ करें।
-दूसरे नवरात्र को दूसरे और तीसरे अध्याय का पाठ करें।
-तिसरे नवरात्रि को चौथे अध्याय का पाठ करें।
-चौथे नवरात्र को पाँच, छठे, सातवें और आठवें अध्याय का पाठ करें।
-पचनेंद्र नवरात्रि को नौवें और दसवें अध्याय का पाठ करें।
-छे नवरात्र को 11 वें अध्याय का पाठ करें।
– सातवें नवरात्रि को 12 और 13 अध्याय का पाठ करें।
यह क्रम उन व्यक्तियों के लिए है जो हर रोज 13 अध्याय नहीं पढ़ सकते हैं।

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दुर्गा सप्तशती में मां के तीन चरित्रों का वर्णन है। पहला चरित्र, मध्यम चरित्र और उत्तर चरित्र। पहली चरित्र में महाकाली की आराधना है। यह चरित्र का पहला अध्याय है। मध्यम चरित्र में महालक्ष्मी की आराधना है। इसमें द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अध्याय आते हैं। उत्तर चरित्र में महासरस्वती की आराधना है। इसमें अध्याय छह से अध्याय 13 तक के पाठ सम्मिलित हैं। यदि हम शत्रुओं से घिरे हों, कोई रास्ता नहीं सूझ रहा हो या संकट का आभास होने वाला हो या विपत्ति निवारण के लिए तो हमें ये पाठ करना चाहिए। प्रथम अध्याय का पाठ नियमित रूप से या नवरात्रों में करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए, धनधान्य वृद्धि के लिए, व्यापार अधिक में उन्नति के लिए मध्यम चरित्र में महालक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए। पूरे नवरात्रों में मध्यम चरित्र के तीनों अध्यायों का एकमात्र पाठ करना चाहिए।
यदि हम ज्ञान, बुद्धि, मोक्ष, भक्ति और शांति चाहते हैं तो हमें उत्तर चरित्र में महा सरस्वती की उपासना करनी चाहिए। उत्तर चरित्र के अध्याय छह से अध्याय 13 तक के नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। मां भगवती का पाठ करने से पहले संकल्प, दुर्गा कवच, अर्गला स्तोत्र और कीलक अवश्य पढ़ना चाहिए। अध्याय के पहले और बाद में अंगन्यास, नवार्ण मंत्र ‘्री ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै’ की एक माला का जाप करना चाहिए।
-प्रथम अध्याय का पाठ करने से व्यवहार से मुक्ति मिलती है।
-द्व बच्चों अध्याय का पाठ करने से मुकदमा, कोर्ट कचहरी में सफलता मिलती है।
-त्रिशयन अध्याय से शत्रु मुक्ति और भय का निवारण होता है।
-चौथे अध्याय का पाठ करने से भक्ति मुक्ति और शांति मिलती है।
-पचनवें अध्याय का पाठ करने से हमें अपने कार्यों में सफलता मिलती है और माता के प्रति भक्ति जागृत होती है।
-छता अध्याय के पाठ करने से मन का भय दूर होता है। बाधाएं दूर हो जाती हैं।
-सातवें अध्याय का पाठ करने से मनोकामना पूर्ण होती है।

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-आठवें अध्याय के पाठ से असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है और वशीकरण होता है।
-नौवें अध्याय का पाठ करने से पुत्र संतान की प्राप्ति और मनोकामना पूर्ण होती है।
-दसवें अध्याय का पाठ करने से मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और सभी का मिलाप होता है।
-ग्यरवेंद्र अध्याय का पाठ करने से व्यापार और नौकरी में उन्नति होती है। घर में सुख शांति बनी रहती है।
-12 वें अध्याय का पाठ करने से मान-सम्मान और लाभ की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
-13 वेंअध्याय का पाठ करने से भक्ति और मुक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार मां की उचित रूप से आराधना पूजा करने से हमें पूर्ण फल मिलता है।
((ये धार्मिक धार्मिक आस्थाएँ और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैं, जिन्हें केवल सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।)

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