सकत चौथ 2021 व्रत कथा देवरानी जेठानी की कहानी तिलक चौथ की

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आज यानी 31 जनवरी 2021 को देशभर में सकट चौथ या संकष्टी चौथ का व्रत रखा जा रहा है। इस दिन लोग भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सकत चौथ का व्रत रखने से संतान निरोगी और दीर्घायु होता है। कहते हैं कि भगवान श्रीगणेश की कृपा से सभी बिगड़े काम भी बन जाते हैं। सकट चौथ के दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। जानिएस्कट चौथ के दिन पढ़ी जाने वाली देवरानी-जेठानी की कहानी-

तिल चौथ की कहानी-

एक शहर में देवरानी-जेठानी रहती थी। जेठानी अमीर थी और देवरानी गरीब थी। देवरानी गणेश जी की भक्त थी। देवरानी का पति जंगल से लकड़ी काट कर बेचता था और अक्सर बीमार रहता था। देवरानी, ​​जेठानी के घर का सारा काम करती है और जेठानी रिस हुआ हुआ खाना, पुराने कपड़े आदि पहनती है। इसी से देवरानी का परिवार चल रहा था।

माघ माह में देवरानी ने तिल चौथ का व्रत किया। 5 आने का तिल व ग्राम लाकर तिलकुट्टा बनाया गया। पूजा करके तिल चौथ की कथा (तिल चौथ की कहानी) सुनी और तिलकुट्टा छींके में रख दिया और सोचा की चांद उगने पर पहले तिलकुट्टा और उसके बाद ही कुछ खाएगी।

कथा सुनकर वह जेठानी के यहाँ चली गई। खाना बनाने वाली जेठानी के बच्चों से खाना खाने को कहा तो बच्चे बोले मां ने व्रत किया हैं और मां भूखी हैं। जब माँ खाना खायेगी हम भी केवल खाएंगे। जेठजी को खाना खाने को कहा तो जेठजी बोले ‘मैं अकेली नहीं खाऊंगा, जब चांद निकलेगा तब सब खाएंगे तब मैं भी खाऊंगा’ जेठानी ने उसे कहा कि आज तो किसी ने भी अभी तक खाना नहीं खाया होगा कैसे दे दूं? तुम सुबह सवेरे ही बचा हुआ खाना ले जाओ।

देवरानी के घर पर पति, बच्चे सब आस लगाए बैठे थे कि आज तो त्योहार हैं इसलिए कुछ थाली आदि खाने को मिलेगी। लेकिन जब बच्चों को पता चला कि आज तो रोटी भी नहीं मिलेगी तो बच्चे रोने लगे। उसके पति को भी बहुत गुस्सा आया कह कर सारा दिन काम करके भी दो रोटी नहीं ला सका तो काम क्यों कर सकता है? पति ने झूठी में आकर पत्नी को कपड़े धोने के धोवने से मारा। धोवना हाथ से छूट गया तो पाटे से मारा गया। वह बेचारी गणेश जी को याद करती हुई रोते-रोते पानी पीकर सो गई।

उस दिन गणेश जी देवरानी के सपने में आए और कहने लगे- धोवने मारी, पटटे मारी सो रही है या जाग रही है …।

वह बोली-‘कुछ सो रही हूँ, कुछ जाग रही हूँ …।

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गणेश जी बोले- भूख लगी हैं, कुछ खाने को दे ‘

देवरानी बोली ‘क्या दूं, मेरे घर में तो अन्न का एक दाना भी नहीं हैं .. जेठानी बचा खुचा खाना खाती थी आज वह भी नहीं मिली। पूजा का बचा हुआ तिल कुट्टा छींके में पड़ा समान खा लो हैं।
तिलकुट्टा खाने के बाद गणेश जी बोले- ‘धोवने मारी, पटटे मारी निमाली शुरू हो चुकी है, जहां निमटे …
वह बोली, यह घर गया, जहाँ इच्छा हो वहाँ निमट लो …

फिर गणेश जी बच्चे की तरह बोले अब कहां पोंछू
नींद में मग्न अब देवरानी को बहुत गुस्सा आया कि कब से तंग किए जा रहे हैं, सो बोली, ‘मेरे सर पर पोंछो और कहा पोछोंगे …

सुबह जब देवरानी उठी तो यह देखकर हैरान रह गई कि पूरा घर हीरे-मोती से जगमगा रहा है, सिर पर जहां विनायक जी पोंछनी कर गए थे वहां हीरे के टीके व बिंदी जगमगा रहे थे।

उस दिन देवरानी, ​​जेठानी के यहाँ काम करने नहीं गई। बड़ी देर तक राह देखने के बाद जेठानी ने बच्चों को देवरानी को बुलाने भेजा। जेठानी ने सोचा कल खाना नहीं दिया होगा इसीलिए शायद देवरानी बुरा मान गई है। बच्चे बुलाने गए और बोले चाची चलो माँ ने बुलाया है सारा काम पड़ा है। देवरानी ने जवाब दिया अब उसकी जरूरत नहीं है। घर में सब भरपूर है गणेश जी के आशीष से …

बच्चो ने घर जाकर मां को बताया कि चाची का तो पूरा घर हीरे मोतियों से जगमगा रहा है। जेठानी दौड़ती हुई देवरानी के पास आई और पूछा कि यह सब हुआ कैसे?
देवरानी ने उसके साथ जो हुआ वो सब कह डाला।

घर लौटकर जेठानी अपने पति से कहा कि तुम मुझे धोवने और पाटे से मास्टर। उसका पति बोला कि भलीमानस मैंने कभी तुम पर हाथ भी नहीं उठाया। मैं तुमे धोवने और पाटे से कैसे मार सकता हूँ। वह नहीं मानी और जिद करने लगी। मजबूर पति को उसे मारना पड़ा।

उसने ढ़ेर सारा घी डालकर चूरमा बनाया और छीकें में रखकर और सो गया। रात को चौथ विनायक जी सपने में कहने लगे लगे, भूख लगी है, क्या खाऊं … जेठानी ने कहा, हे गणेश जी महाराज, मेरी देवरानी के यहां तो आपने सूखा तिलकुट्टा खाया था, मैं तो झरते घी / चूरमा बनाकर आपके लिए छींके। मे रखे हुए हैं, फल और मेवे भी रखे हुए हैं जो चाहते हैं खा रहे हैं …

बाल गणेश जी बोले अब बसते कहाँ …

जेठानी बोली, उसके यहाँ
तो टूटी फूटी झूठा मेरे यहाँ था तो कंचन के महल हैं जहाँ चाहो बसो …

फिर गणेश जी ने पूछा, अब पोंछू कहां …

जेठानी बोली, मेरे ललाट पर बड़ी सी बिंदी लगाकर पोंछ लो …

धन की भूखी जेठानी सुबह बहुत जल्दी उठ गई। सोचा घर हीरे-जवाहरात से भर चूका होगा पर देखा तो पूरे घर में गंदगी फैली हुई थी। तेज बदबू आ रही थी। उसके सिर पर भी बहुत सी जलन हुई थी। उसने कहा ‘हे गणेश जी महाराज, यह आपने क्या किया …

मुझे रूठे और देवरानी पर टूटे। जेठानी ने घर और की सफाई करने की बहुत ही कोशिश करी लेकिन गंदगी और ज्यादा फैलती चली गई। जेठानी के पति को मालूम चला तो वह भी बहुत नाराज हुई और बोला तुम्हारा पास सब कुछ था फिर भी तेरा मन नहीं भरा।

परेशान होकर चौथ के गणेशजी से मदद की विनती करने लगी। गणेश जी ने कहा, देवरानी से जलन के कारण तूने जो किया था यह उसी का फल है। अब आप अपने धन में से आधा उसे दे देंगे तो यह सब साफ हो जाएगा …

उसने आधा धन बांट दिया कि लेकिन मोहरों की एक हांडी चूल्हे के नीचे गाढ़ रखी थी। उसने सोचा कि किसी को पता नहीं चलेगा और उसने उस धन को नहीं बांटा। उन्होंने कहा ‘हे श्री गणेश जी, अब तो यह यह बिखराव समेटो, वे बोले, पहले चूल्हे के नीचे गाढ़ी हुई मोहरों की यडी सहित ताक में रखी दो सूट के भी दो हिस्से कर कर रहे हैं। इस प्रकार प्रकारग जानन ने बाल स्वरूप में आकर सुई जैसी छोटी चीज का भी बंटवारा किया और अपनी माया समेट।

हे गणेश जी महाराज, जैसे आपने देवरानी पर कृपा की वैसी सब पर करना। कहानी कहने वाले, सुनने वाले व हुंकारा भरने वाले सब पर कृपा करना। लेकिन जेठानी को जैसी सजा दी वैसी किसी को मत देना।

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