Serial Story- एक तवायफ मां नहीं हो सकती: भाग 3

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राठौर साहब ने उसे एक लिफाफा देते हुए कहा, ‘‘चलो, ये रखो, हम इसे काम दे देंगे. इस खुशी में मुंह मीठा होना चाहिए.’’

राठौर ने जमाल को सौ रुपए का नोट दे कर कहा कि जा कर मिठाई ले आए. जमाल ने शादो से कहा, ‘‘मैं मिठाई ले कर आता हूं.’’

जब जमाल को गए काफी देर हो गई तो शादो घबरा कर रोने लगी. वे लोग बोले, ‘‘रोओ नहीं, जमाल अभी आ जाएगा.’’

लेकिन वह नहीं मानी और जोरजोर से रोने लगी. इस पर राठौर ने कहा, ‘‘यार, ये लड़की तो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर देगी. इसे सुला दो.’’

एक आदमी ने एक शीशी ले कर रुमाल पर लगाई और शादो का मुंह दबोच लिया. इस से वह बेहोश हो गई. जब उसे होश आया तो वह एक कमरे में बंद थी. इस के बाद उस के साथ वही खेल खेला जाने लगा जो जमाल और उस का मित्र खेल चुके थे.

राठौर से पता लगा कि जमाल उसे बेच कर चला गया है. राठौर ने उसे यह भी बताया कि जब उस से दिल भर जाएगा तो उसे वेश्याओं को बेच देगा. यह सुन कर शादो ने वहां से भागने का इरादा किया.

एक दिन राठौर ने बहुत शराब पी और सो गया. शादो ने उस की जेबों की तलाशी ली तो उसे काफी नोट मिल गए. उस ने जल्दीजल्दी उस की जेब से नोट निकाले और वहां से भाग कर सीधा रिक्शा कर के स्टेशन पहुंची. वह अपने घर वापस जाना नहीं चाहती थी. उस ने आत्महत्या करने के बारे में भी सोचा.

शादो परेशान हाल सी बेंच पर बैठी रो रही थी कि उस पर एक शरीफ से आदमी की नजर पड़ गई. उस व्यक्ति ने उस की परेशानी का कारण पूछने के बाद कहा, ‘‘अगर ऐसे ही रोती रही तो किसी गलत आदमी के हत्थे चढ़ जाओगी.’’

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उस ने रोरो कर अपनी विपदा सुनाई. उस आदमी ने उस से कहा कि वह उस की पूरी मदद करेगा और उसे उस के घर छोड़ देगा. शादो ने घर जाने से मना कर दिया तो वह आदमी कहने लगा कि अगर उसे विश्वास हो तो वह उस के साथ चले. उस आदमी की शराफत को देख कर वह उस के साथ चलने को तैयार हो गई.

वह आदमी मसूद अहमद था. मसूद उसे अपने एक मित्र के घर ले गया और वहां उस से शादी का प्रस्ताव रखा. साथ ही उसे यह भी बता दिया कि वह विवाहित है और उस के बच्चे भी हैं. शादो उस से शादी के लिए तैयार हो गई. मसूद ने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया और शादो से निकाह कर के उसे एक अलग मकान में रखा.

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अपनी इस शादी के बारे में मसूद ने अपने घर वालों को नहीं बताया. शादो मसूद द्वारा दिलाए गए घर में रह कर उस की सेवा करने लगी. उस के साथ जो गलत काम हुआ था, उस की वजह से उस के शरीर में ऐसी खराबी आ गई कि वह मां बनने के लायक नहीं रह गई थी. साल डेढ़ साल ठीक से गुजरा. फिर अचानक मसूद गंभीर रूप से बीमार हो गया. उस ने शादो से कहा कि मेरे मरने के बाद पता नहीं तुम्हारा क्या हो, इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम्हें अपनी पत्नी के हवाले कर जाऊं, वह बहुत शरीफ औरत है, तुम्हारा पूरा ध्यान रखेगी.

फिर मसूद अहमद ने अपनी पहली पत्नी सरदारी बेगम को बुला कर पूरी कहानी सुनाई और शादो को उस के हवाले कर दिया. सरदारी बेगम ने पति से वादा किया कि वह उस का पूरा खयाल रखेगी. उस ने शादो का इतना साथ दिया कि वह अपने बच्चों को छोड़ कर शादो के साथ रहने लगी.

शादो के इतने लंबे बयान से मुझे लगा कि शादो जैसी शरीफ औरत सरदारी बेगम को जहर नहीं दे सकती, इसलिए मैं ने उसे घर जाने दिया. मैं सरदारी के हत्यारे के बारे में सोचने लगा. सोचविचार कर मैं ने शरीफ से पूछताछ करने का इरादा किया. एक मुखबिर ने मुझे बताया कि शरीफ शादो के खिलाफ तो था ही, जब उस की मां ने उस की बात नहीं मानी तो वह अपनी मां के भी खिलाफ हो गया था.

वह कहता था कि उस की मां उस की बदनामी करा रही है. लोग उस पर थूथू कर रहे हैं. जवान बेटों के होते हुए वह बच्चों को पढ़ा कर अपना गुजारा कर रही है. शरीफ ने पूरी कोशिश कर के देख ली कि उस की मां शादो को छोड़ दे, लेकिन उस की मां अपने दिवंगत पति से किया हुआ वादा तोड़ना नहीं चाहती थी.

अगले दिन मैं ने अपने एएसआई से शरीफ को उस के औफिस से लाने के लिए कहा. शरीफ एक सरकारी औफिस में स्टेनो था. वह उसे लेने चला गया. तभी 2 औरतें मेरे कमरे में आईं. उन में से एक शादो थी और दूसरी उस के स्कूल की टीचर. दूसरी औरत ने अपने पर्स में से एक पर्चा निकाल कर मुझे दिया. वह पर्चा शादो के नाम था. मैं ने उसे पढ़ा तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं सोच भी नहीं सकता था कि मेरी समस्या इतनी जल्दी हल हो जाएगी.

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यह पर्चा सरदारी बेगम का शादो के नाम था, जिस में लिखा था, ‘आज शरीफ मेरे पास हलवा ले कर आया और उस ने बहुत कोशिश कर के मुझे हलवा खिलाया. कुछ देर तक वह मेरे पास बैठा और फिर चला गया. उस के जाने के बाद मेरा दिल मिचलाने लगा. मेरी सांस रुकने लगी. मैं समझ गई कि हलवे में वह मुझे जहर दे कर गया है. अब मैं बच नहीं सकूंगी. मैं यह तहरीर लिख कर संदूक में रख रही हूं, जिस से कि किसी निर्दोष को तंग न किया जाए.’ उस पर्चे में सब से नीचे सरदारी बेगम ने अपना नाम भी लिखा था.

मैं ने मिस्ट्रैस से पूछा कि यह पर्चा तुम्हें कहां से मिला. इस का जवाब शादो ने दिया. उस ने बताया कि सरदारी बेगम के पास एक ट्रंक था. उस की चाबी वह अपने सिर के पीछे की ओर बालों के नीचे लटका कर रखती थी. जिस दिन वह मरी तो मैं ने सब से पहले वह चाबी बालों से निकाल कर अपने पास रख ली थी. बाद में मैं उस चाबी के बारे में भूल गई थी.

भूलने का कारण यह था कि वह ट्रंक इतना महत्त्वपूर्ण नहीं था. उस में पैसा या जेवर जैसी कीमती कोई चीज नहीं थी. उस में वह अपने पति के कपड़े रखती थी. शादो उसे याद कर के बहुत रोती थी. यह उस दिन की बात है जब वह थाने आई थी. उस दिन वह रो रही थी तो वही मिस्ट्रैस जो उस के साथ आई थी. उस ने रोने का कारण पूछा तो उस ने कहा, ‘‘सरदारी को मरे काफी दिन हो गए हैं. उसे अपना कुछ सामान उस घर से लाना है, लेकिन वहां जाते डर लगता है.’’

मिस्ट्रैस ने कहा, ‘‘चलो मेरे साथ.’’

वह उस के साथ चली गई और वहां जा कर उस ने अपना सामान इकट्ठा किया. तभी उस की नजर सरदारी के संदूक पर पड़ी तो शादो से चाबी ले कर उसे खोला. कपड़ों के ऊपर यह पर्चा रखा मिला. पर्चा पढ़ते ही टीचर शादो को ले कर सीधी थाने आ गई थी.

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