Valentine’s Special- मौन स्वीकृति: भाग 1

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उस समय मैं एमए फाइनल ईयर में थी. परीक्षा की तारीख नजदीक थी. तैयारी के लिए अपने कालेज की लाइब्रेरी में कुछ महत्त्वपूर्ण नोट्स तैयार करने में लगी हुई थी. मेरी ही टेबल पर सामने एक लड़का भी अपने कुछ नोट्स तैयार करने में लगा था. मैं लंच ब्रेक में लाइब्रेरी जाती और वह लड़का भी उसी समय मेरे ठीक सामने आ कर बैठ जाता. एक दिन जब मैं लाइब्रेरी की अलमारी से कुछ किताबें हाथों में ले कर आ रही थी तभी उस के पास पहुंचते ही उन में से कुछ किताबें फिसल कर उस के पैरों पर जा गिरीं.

‘‘सौरी,’’ बोलते हुए मैं पुस्तकों को उठाने लगी. उस ने किताबों को उठाने में मेरी मदद की और मेरे हाथों में उन्हें थमाते हुए बोला, ‘‘नो प्रौब्लम, कभीकभी ऐसा हो जाता है.’’

उस के बाद हम दोनों में अकसर बातें होने लगीं. बातचीत से पता चला कि वह गांव का रहने वाला एक गरीब विद्यार्थी था जो एमए की तैयारी कर रहा था और उस का मकसद बहुत ऊंचा था. वह एमए करने के बाद सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चाहता था. वह अपने कुछ साथियों के साथ एक कमरा किराए पर ले कर रहता था और वे लोग अपना खाना खुद बनाते थे और बहुत ही कम पैसे में अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहते थे. वे सभी किसानों के लड़के थे. उस का नाम रवि था.

रवि गरीब जरूर था लेकिन शरीर से सुडौल और मन से शांत चित्त वाला एक बहुत ही अच्छे स्वभाव का मधुरभाषी व दूसरों की मदद करने की भावना लिए एक हंसमुख लड़का था. कभीकभी बहुत आग्रह करने पर रवि मेरे साथ कालेज के कैफेटेरिया में जाता और एक कप चाय से ज्यादा कुछ नहीं लेता. जबरन चाय का पैसा मैं ही देती.

लगातार कई दिनों तक एक ही टेबल पर एकसाथ नोट्स बनाते हुए एकदूसरे के प्रति काफी लगाव महसूस होने लगा और जब कभी रवि कालेज की लाइब्रेरी में नहीं आता तो मेरा मन उस के लिए बेचैन हो उठता. उस का भी एमए फाइनल था किंतु उस का सब्जैक्ट अलग था, इसलिए मेरी कक्षा में नहीं बैठता था.

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मेरे पिताजी एक उच्च सरकारी पदाधिकारी थे और मां के गुजर जाने के बाद मैं ही उन के लिए बेटीबेटा सबकुछ थी. मैं जो कुछ चाहती, पिताजी मुझे उपलब्ध कराते. मैं इकलौती बेटी थी. घर में कोई कमी नहीं थी. पिताजी ने हैदराबाद में एक फ्लैट खरीदा था. रिटायरमैंट के बाद वे वहीं रहने लगे थे.

एमए करने के बाद हम दोनों अलगअलग हो गए. रवि एमए करने के बाद सिविल सर्विसेज के लिए  कंपीटिशन की तैयारी करने लगा.

कई कंपीटिशन की तैयारी करते हुए अंत में मुझे इनकम टैक्स औफिसर की नौकरी मिल गई. रवि किसी जिले में फौरैस्ट औफिसर बन गया. अलगअलग क्षेत्र में होने के कारण हमारा संबंध भी टूट गया.

इनकम टैक्स औफिसर के रूप में मेरे साथ ही प्रवीण का भी चयन हुआ था. प्रवीण लंबा, गोरा और स्मार्ट था. हमारी ट्रेनिंग दिल्ली में थी. जिस इंस्टिट्यूट में टे्रनिंग हो रही थी उसी बिल्ंिडग में हमारा होस्टल भी था, किंतु हमारा एकदूसरे से महज औपचारिक संबंध था.

एक दिन शाम को ट्रेनिंग के बाद मैं शौपिंग करने बाजार गई थी. वहां प्रवीण भी मिल गया.

‘‘अकेले ही शौपिंग करने आई हो?’’ प्रवीण ने मुसकराते हुए पूछा. ‘‘हां,’’ उसे देख कर जाने कैसे मेरे चेहरे पर भी मुसकराहट बिखर गई.

‘‘शौपिंग हो गई कि अभी बाकी है?’’

‘‘हो गई,’’ मैं ने संक्षिप्त जवाब दिया.

‘‘फिर चलो, कौफी पी कर होस्टल लौटते हैं.’’

प्रवीण के आग्रह को मैं ठुकरा न पाई और हम दोनों एक कौफी हाउस में आ कर एक टेबल पर बैठ गए. ‘‘तुम कहां के रहने वाले हो?’’ मैं ने पूछा तो प्रवीण बोला, ‘‘मेरठ. वहां मेरे पिताजी की  होलसेल की 4 दुकानें हैं.’’

‘‘अच्छा, तो तुम बिजनैसमैन हो.’’

‘‘हां, लेकिन अब तो नौकरी में हूं.’’

‘‘अच्छा है, कम से कम अब बेवजह इनकम टैक्स वाले तुम्हारे परिवार को तंग नहीं करेंगे.’’

‘‘हां, कुछ तो फायदा होगा ही.’’

कौफी पी कर हम लोग एक ही औटो में होस्टल आए. इस के बाद हम लोग ट्रेनिंग के दौरान रिसेस में एकसाथ चाय पीते, लंच भी साथ लेते और कभीकभी डिनर में भी साथ हो जाते. टे्रनिंग के बाद अकसर हम लोग मार्केट निकल जाते. सारे खर्च प्रवीण ही करता. जब कभी मैं पेमैंट करने की कोशिश करती, वह रोक देता.

यह संयोग ही था कि ट्रेनिंग के बाद मेरी पोस्ंिटग मेरठ में हो गई और उस की हैदराबाद में. प्रवीण को एक दिन मैं अपने पिताजी से मिलाने ले गई. प्रवीण ने उन्हें प्रणाम किया और सोफे पर पसर गया.

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‘‘यह प्रवीण है, इसी शहर में इनकम टैक्स औफिसर है.’’

‘‘तुम लोग कहां के रहने वाले हो, बेटा?’’ पिताजी ने पूछा तो उस ने सोफे पर पसरे ही पसरे कहा, ‘‘मेरठ.’’

‘‘तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं?’’

‘‘इस के परिवार का बहुत बड़ा बिजनैस है पापा,’’ मैं बोली तो पापा कुछ बोले तो नहीं किंतु उन के हावभाव से लग रहा था प्रवीण के व्यवहार से वे संतुष्ट नहीं हैं.

उस के बाद प्रवीण उन से कभी न मिला. किंतु मैं अकसर प्रवीण के मांबाबूजी से मिलती. उन का व्यवहार मेरे प्रति बहुत अच्छा था. वे लोग मुझे बेटी सा मानते. कुछ न कुछ इनकम टैक्स से संबंधित उन का काम रहता, जिसे मैं अपने पद के प्रभाव से जल्दी निबटा देती.

हम दोनों के बीच संबंध गहराता जा रहा था. जब प्रवीण मेरठ आता तो मेरे क्वार्टर में मुझ से मिलने अवश्य आता. हम शाम में एकसाथ डिनर लेते. प्रवीण को रात में खाने से पहले डिं्रक की आदत थी. मैं उसे डिं्रक लेने से रोकती तो वह हंस कर टाल जाता. मैं सोचती कि किस अधिकार से प्रवीण को डिं्रक लेने से रोकूंगी, इसलिए वह नहीं मानता, तो चुप हो जाती.

एक दिन प्रवीण मेरे क्वार्टर में आया हुआ था. उस दिन मैं ने नौनवेज बनाया था और प्रवीण अपने साथ व्हिस्की की एक बोतल लेते आया था. उस दिन उस ने कुछ ज्यादा ही पी ली थी और उस का सुरूर उस पर चढ़ने लगा था.

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