Valentine’s Special- मौन स्वीकृति: भाग 2

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मैं ने कहा, ‘‘डिं्रक की आदत अच्छी नहीं है. धीरेधीरे तुम इस के आदी बनते जा रहे हो. आज तो तुम ने कुछ ज्यादा ही ले ली है. अब घर कैसे जाओगे?’’

‘‘यार, आज यहीं सो जाता हूं. घर पर इस अवस्था में जाऊंगा तो मांबाबूजी को बुरा लगेगा. मैं पीता जरूर हूं लेकिन उन से छिपा कर. बाबूजी जानेंगे तो उन्हें बहुत दुख होगा.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे बाबूजी खोजेंगे. तुम घर चले जाओ. ड्राइवर को बोल देती हूं, तुम्हें पहुंचा देगा.’’

‘‘नहीं, आज यहीं सोने दो. ड्राइवर से बाबूजी पूछेंगे और कहीं वह सचसच बता देगा तो यह और बुरा होगा.’’

‘‘लेकिन मेरे यहां तो एक ही बैड है. यहां अब तक कोई आया ही नहीं, इसलिए इस की आवश्यकता नहीं महसूस हुई.’’ मैं अब चिंतित होने लगी थी.

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं नीचे सो जाऊंगा.’’

‘‘बाबूजी को फोन कर दो. तब तक मैं अपने सोने का इंतजाम करती हूं.’’

मैं ने सोचा आज डाइनिंग टेबल पर ही बैड लगा देती हूं.

प्रवीण ने अपनी मां को फोन कर के बताया कि वह आज अपने दोस्त के साथ रह गया है. कल आएगा. उस ने जानबूझ कर मेरे साथ रहने के बारे में न बताया. अब यह बताता भी कैसे कि वह मेरे साथ रात में अकेले रुका हुआ है. लोग जानेंगे तो क्या कहेंगे.

उस का मेरे घर में अकेले रुकना मुझे भी अच्छा नहीं लग रहा था. आखिर वह पुरुष है. देररात में उस ने कुछ गलत करने का प्रयास किया तो मैं अकेले उस का कैसे विरोध कर पाऊंगी.

लेकिन अब और कुछ हो भी नहीं सकता था. मैं ने अपना बैड डाइनिंग टेबल पर लगाया तो वह बोला, ‘‘मैं तुम्हारे बैड पर सोऊं और तुम डाइनिंग टेबल पर, यह अच्छा नहीं लगता. तुम अपने कमरे में सो जाओ. मैं ही डाइनिंग टेबल पर सो जाता हूं.’’

‘‘लेकिन यह अच्छा नहीं होगा, आखिर तुम मेरे गेस्ट भी तो हो.’’

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इन्हीं तर्कवितर्क में कब वह नशे में आ कर बैड पर सो गया, पता ही नहीं चला. फिर जब मैं डाइनिंग टेबल पर सोने गई तो पतला बैड होने के कारण उस पर मुझे नींद नहीं आ रही थी, साथ ही उस पर से रात में ढुलक कर गिरने का भी भय लग रहा था. सो, मैं ने सोचा कि प्रवीण अब होश में तो है नहीं, क्यों न मैं पलंग पर किनारे सो जाऊं.

फिर नींद में प्रवीण जाने कब मेरे पास सरक आया. जीवन में पहली बार किसी पुरुष की देह को इतनी नजदीक पा कर मैं अपने होश खो बैठी और हम सारी मर्यादाएं भूल कर एक हो गए.

जब सुबह नींद टूटी तो हम अस्तव्यस्त कपड़ों में एकदूसरे से लिपटे सो रहे थे. मैं झटके से अलग हटी. मुझे लगा मुझ से एक बड़ी गलती हो गई है. हां, गलती तो मेरी ही थी. मैं ही तो उस के साथ पलंग पर सो गई थी. अगर ऐसा नहीं करती तो यह शर्मनाक घटना न घटती.

प्रवीण भी आंखें नीची किए हुए उठा और गुसलखाने चला गया. जब वह लौटा तब मैं मायूस सा चेहरा बनाए बैठी थी. वह किचन में चाय बनाने चला गया. मैं जानती थी कि उसे किचन में चाय का सामान नहीं मिलेगा. इसलिए बिना कुछ बोले दूध, चाय पत्ती और चीनी उस के सामने रख कर चली आई. वह एक ट्रे में 2 कप चाय ले कर आया और मेरी तरफ एक कप चाय बढ़ाते हुए कहा, ‘‘चाय पियो, जो होना था हो गया.’’

‘‘लेकिन यह अच्छा नहीं हुआ,’’ मैं दुखी हो कर बोली.

‘‘अब जानबूझ कर तो हम ने कुछ किया नहीं, रितु. कभीकभी वह हो जाता है जो हम नहीं चाहते. लेकिन चिंता न करो हम जल्दी ही शादी कर लेंगे.’’

‘‘लेकिन तुम्हारे मांबाबूजी इस के लिए तैयार होंगे तब तो?’’

‘‘उन्हें मैं मना लूंगा. वे हमेशा ही तुम्हारी प्रशंसा करते हैं.’’

‘‘लेकिन मेरे पापा न मानेंगे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘वे अपने एक दोस्त के बेटे से मेरा रिश्ता करना चाहते हैं.’’

‘‘अब यह जिम्मेदारी तुम्हारी है कि उन्हें कैसे मनाओगी.’’

उस रात के बाद हम लोग अकसर रात एकसाथ बिताते.

प्रवीण ने अपने मांबाबूजी से कहा तो कुछ नानुकुर के बाद वे लोग हमारी शादी के लिए तैयार हो गए. हालांकि बिजनैसमैन कम्युनिटी के उस के कई रिश्तेदार अपनी लड़की से उस की शादी के लिए जोर दे रहे थे किंतु मेरे साथ शादी की उस की जिद पर सभी चुप हो गए.

मैं अपने बाबूजी की इकलौती बेटी थी. मां के निधन के बाद उन्होंने मुझे बेटे जैसा पालापोसा था. मेरी जिद के आगे उन्हें भी झुकना पड़ा और आखिरकार हम लोग विवाह के बंधन में बंध गए.

शादी का हवाला दे कर हम लोगों ने अपनी पोस्ंिटग अगलबगल के ही जिलों में करा ली. शादी के पहले प्रेमीप्रेमिका के बीच जो संबंध होते हैं वे बड़े ही मधुर और उल्लासवर्धक होते हैं क्योंकि एकदूसरे को पाने के लिए उन के दिलों में जज्बा होता है. किंतु जब प्रेमीप्रेमिका आपस में शारीरिक संबंध बना लेते हैं तब इस का आकर्षण धीरेधीरे कम होने लगता है.

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हम लोगों के बीच भी यही हो रहा था. शादी के बाद कुछ महीनों तक तो हम लोग एकदूसरे के साथ बड़े ही उल्लास से मिलते रहे, किंतु बाद में धीरेधीरे प्रवीण के व्यवहार में परिवर्तन होने लगा. शुक्रवार को कभी मैं उस के यहां चली जाती और कभी वह मेरे यहां आ जाता क्योंकि हमारे औफिस में शनिवार को छुट्टी रहती थी.

लेकिन इधर मैं देख रही थी कि वह न तो मेरे यहां आना चाह रहा है, न मेरा उस के यहां जाना उसे पसंद आ रहा है. वह कुछ कहता तो नहीं था लेकिन मैं उस के हावभाव से महसूस कर रही थी कि उस का ध्यान मुझ से हट कर कहीं और भटक रहा है.

जब मैं कभी उस से अपने यहां आने के लिए कहती तो वह काम के बोझ का बहाना बना कर टाल देता और जब कभी मैं उस के यहां पहुंच जाती तो औफिस का वर्कलोड बता कर रात में देर से लौटता.

एक दिन शाम को मैं सप्ताहांत में प्रवीण के यहां पहुंची. प्रवीण अभी औफिस से नहीं लौटा था. हम लोगों के पास एकदूसरे के क्वार्टर की चाबी रहती थी. मैं ने देखा कि उस के वार्डरोब में कपड़े बेतरतीब ढंग से रखे हुए थे. सोचा, प्रवीण अकेले रहता है, इसलिए कपड़ों को जैसेतैसे रख देता है. फिर मैं इन कपड़ों को एकएक कर निकालने लगी ताकि उन्हें तह कर के ढंग से रख सकूं. तभी छोटा सा जेवरों का डब्बा नीचे गिर गया. मैं ने उसे खोल कर देखा तो उस में एक बहुत ही कीमती प्लेटिनम धातु में जड़ी हीरे की अंगूठी थी. मैं सोचने लगी कि इस अंगूठी के बारे में तो प्रवीण ने मुझे कभी नहीं बताया. यह कहां से आई और यहां अलमारी में कपड़ों में छिपा कर क्यों रखी हुई है. फिर मैं ने सोचा या तो प्रवीण को इसे किसी ने रिश्वत में दी होगी या किसी प्रेमिका को देने के लिए उस ने खरीदी होगी और मैं देख न लूं, इसलिए इसे यहां छिपाया है.

फिर मुझे संदेह हुआ कि कहीं यह रिश्वत में मिली अंगूठी तो नहीं है क्योंकि अगर उसे अंगूठी अपनी किसी प्रेमिका को देनी होती तो उस से पसंद करा कर उसे तुरंत दे दी होती. यहां छिपा कर नहीं रखता. इसलिए मैं दूसरे रखे और कपड़ों को भी वहां से हटाने लगी तो देखा, 2 हजार रुपयों की कई गड्डियां कपड़ों में रखी हुई हैं.

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