Valentine’s Special- मौन स्वीकृति: भाग 4

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‘‘नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं किया प्रवीण, किंतु जो किया इस से ज्यादा घातक है. मेरी गलती पर तुम मुझे डांटते, मारपीट भी देते या हमारे दांपत्य जीवन में जहर घोलने वाले मेरे व्यक्तिगत जीवन में दखल भी देते तो मैं बिलकुल बुरा नहीं मानती क्योंकि इतना तो पति के नाते तुम्हारा अधिकार बनता ही है. लेकिन जो तुम कर रहे हो वह मुझ से सहन नहीं होता. तुम मेरी जिंदगी में अचानक आए थे, परिथितियां ऐसी बनीं कि हम दोनों वैवाहिक जीवन में बंध गए. तुम रिश्वत लेने लगे, उस का मैं ने विरोध किया लेकिन इस से मैं उतनी आहत न हुई. मुझे लगता था कि तुम समझ जाओगे लेकिन तुम न समझे और एक नया घटिया तरीका अपना लिया.’’

प्रवीण कुछ न बोला. मेरी बातों में सचाई थी जिस के प्रतिकार का उस के पास नैतिक बल नहीं था.

मैं निकलने लगी तो उस ने रोका. लेकिन मैं अब रुकना नहीं चाहती थी, क्योंकि मैं अब उस जैसे अनैतिक इंसान के साथ नहीं रहना चाहती थी.

मैं उस रात होटल में रही. जानबूझ कर पापा के पास नहीं गई. सोचा, पापा इतनी रात को आने का कारण पूछेंगे तो क्या जवाब दूंगी, कहीं गुस्से में सचाई मुंह से निकल गई तो उन्हें काफी तकलीफ होगी.

रातभर एक झंझावात से मेरा दिमाग घूमता रहा. क्या मैं ने यह उचित किया? क्या मुझे प्रवीण को संभलने का एक और मौका देना चाहिए था? क्या वैवाहिक जीवन को खत्म करने का यह फैसला जल्दी में लिया गया है?

लेकिन मेरे दिल के किसी कोने से आवाज आई. वह वैवाहिक जीवन ही कैसा जो इस की मर्यादाओं का पालन न करे. सच तो यह था कि वैवाहिक जीवन में बंधने का मेरा यह फैसला ही जल्दी में लिया गया था. यह मेरी एक गलती का परिणाम था. मुझ से प्रवीण को ही समझने में गलती हुई थी. पापा उसे एक ही मुलाकात में समझ गए थे जब उस ने उन्हें प्रणाम किया था और उन के सामने ही वह सोफे पर पसर गया था. पापा ने उस के अंदर तक झांक लिया था.

जब मैंने पापा से प्रवीण से शादी की इजाजत मांगी थी, उन्होंने इस का पुरजोर विरोध किया था, लेकिन उस समय मैं प्रवीण के प्यार में पागल थी. उन के इशारों को मैं न समझ पाई थी. यह बात मुझे समझ में नहीं आईर् कि हमारे बुजुर्गों के पास एक लंबे समय का अनुभव होता है और वह अनुभव हमें कई परेशानियों से बचा सकता है. किंतु अब क्या हो सकता था. मैं दूसरे दिन मेरठ लौट आई और इस विषय पर सलाह लेने के लिए शहर के एक सीनियर वकील से मिली.

प्रवीण से तलाक लेने के लिए एक ठोस साक्ष्य की जरूरत थी जो मेरे पास नहीं था. म्यूचुअल डिवोर्स के लिए प्रवीण तैयार होगा, इस पर मुझे संदेह था. फिर भी मैं ने सोचा, क्यों न प्रवीण से इस बिंदु पर चर्चा की जाए. शायद तैयार ही हो जाए. अभी हमारी शादी को एक वर्ष से कुछ ही दिन ज्यादा हुए थे और हमारे अब तक कोई बच्चा नहीं था. यह अच्छा ही था क्योंकि पतिपत्नी के तलाक के बीच सब से ज्यादा बच्चे ही परेशान होते हैं. उन्हें न मां का पूरा प्यार मिल पाता है न पिता का और जीवन की शुरुआत से वे एक तल्ख जीवन जीने के लिए मजबूर हो जाते हैं और उन का बचपन मातापिता के झगड़े में तनाव व चिंता में बीतने लगता है.

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उस दिन के बाद से मैं ने न प्रवीण को फोन किया और न ही उस ने मुझ से बात करने की कोशिश की. हमारे बीच पैदा हुई खाई दिनोंदिन और गहरी होती जा रही थी. एक दिन इनकम टैक्स के सभी अफसरों की मीटिंग के लिए हैडक्वार्टर से बुलावा आया था. जब मीटिंग हौल में मेरी प्रवीण से मुलाकात हुई तो वह मुझ से अपनी नजरें बचाता हुआ दूसरे मित्रों से बात करने लगा.

‘‘अरे भाभी, आप से प्रवीण की कुछ अनबन चल रही है क्या. आप लोगों को आपस में बातें करते नहीं देखा,’’ रिषि ने पूछा तो मैं ने उस से इधरउधर की बातें कर के प्रसंग को टाल दिया. लेकिन बातों को टालने से सचाई तो खत्म नहीं हो जाती. हमारे बीच की तनातनी ने हमारे कई साथियों के मन में संदेह पैदा कर ही दिया.

जब शाम को मीटिंग खत्म हुई तो मैं प्रवीण के पास जा कर बोली, ‘‘प्रवीण, हम लोगों के बीच जो मसले हैं वे आसानी से हल होने वाले नहीं लगते. इस तरह घुटघुट कर जीवन जीने से तो अच्छा है कि हम दोनों अलग हो जाएं. अगर तुम कोऔपरेट करोे तो हम दोनों म्यूचुअल डिवोर्स ले लें.’’

‘‘तुम तो ऐसी बात करती हो जैसे डिवोर्स बच्चों का खेल हो. जब चाहे शादी कर ली, जब चाहे डिवोर्स

ले लिया.’’

‘‘तो तुम ही बताओ क्या करें हम. जो तुम कर रहे हो, क्या सही है?’’

‘‘तुम गलतफहमी की शिकार हो. वैसा कुछ नहीं है जैसा तुम समझ रही हो.’’

‘‘प्रवीण, अगर तुम्हारे व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है और तुम आगे कोई ऐसा काम नहीं करोगे जिस से मुझे तुम से कोई भी शिकायत हो तो मैं डिवोर्स की बात वापस ले लूंगी.’’

‘‘प्रौमिस, अब आगे तुम्हें मुझ से कोई शिकायत न होगी.’’

मैं ने प्रवीण की बातों पर विश्वास कर लिया और एक बार फिर हमारा आपस में मिलनाजुलना शुरू हो गया. किंतु प्रवीण में कोईर् सुधार नहीं हुआ. वह मुझ से झूठे वादे करता रहा और रिश्वत का खेल खेलता रहा. हां, अब वह किसी कौलगर्ल को घर में बुलाने की जगह उन्हें होटल ले जाने लगा और आखिरकार, वही हुआ जिस का मुझे भय था. विजिलैंस वालों ने उसे रंगेहाथों पैसा लेते हुए पकड़ लिया और जेल भेज दिया.

विजिलैंस वालों ने छापा मार कर उस के क्वार्टर से एक करोड़ से भी ज्यादा नकदी रुपए जब्त किए. उस हीरे की अंगूठी के साथ अन्य कई जेवरात भी बरामद हुए थे. साथ ही, कई अन्य आपत्तिजनक दस्तावेज भी बरामद किए गए थे.

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